माँ सरस्वती की वंदना


विनती करूँ मैं आज, तेरी मातु शारदे
दूर करो मोह,तम जड़ता को जग़ से
वास जन-जन के हृदय में तुम आज करो
झूम उठें स्वर, ज्ञान वीणा की झंकार से।

वाणी की हो स्वामिनी, दो ज्ञान ऋत शब्दों का
हो तेज पूर्ण जग, भागे तम ज्ञान दीप से
तुम हो उदार भावे,होतीं आद्र भक्त कष्ट में
रखो लाज आज, मत टारो मुझे द्वारे से।

दो शक्ति कि मिटा सकें, हम दर्द को जहान से
दो दिव्य ज्ञान दान, दूर अंधकार को करें।
वतन की रक्षा कर सकें , वह बाहुबल पैदा करो
    हर दिल में दो वह प्यार कि सब साथ ही जीएँ-मरें।
हर विपद में धीरज रहे,सद्मार्ग को भूलें नहीं
   हर पथ का पाठक उन्नति की ओर ही हम रुख करें।


रचना-1
तुम
तुम भूल तो सकते हो मेरे दोस्त
कुछ समय के लिए
उन शाश्वत सत्यों को
 और रख सकते हो
  छलावे में अपने आप को
  उन, मिथ्या और
   क्षणिक सुखों की
  
चासनी में डुबोकर
  जिनके सामने,
  
आगे-पीछे
  या फिर
  
ऊपर और नीचे
  तुम्हें कुछ दिखाई नहीं देता।
  कोई दर्पण
   जो तुम्हें
  तुम्हारा
  असली चेहरा
  
दिखाने की कोशिश करता है,
  
तुम्हारा अहं,
  
उसे चकनाचूर कर देता है।
 तुम्हें याद भी होगा
 या कहूं कि
 तुम्हें फुर्सत ही कहाँ है
 जो ये जानो कि
 अब तक कितने दर्पण,
 
तुम्हारी,
 
बेरहमी का शिकार हुए हैं।
 ऐसा हो कि
 एक दिन
 उनके टुकडे
 बिखरते-बिखरते
 इतने हो जायें कि
 
घर से बाहर निकले, तुम्हारे हर कदम को
 लहू-लुहान कर दें।
 तब,
 
और तब,
 
क्या होगा मेरे दोस्त,              
 जब गुजर जाएगा वह, जिसे,
 
आज तक,
 
तुम रोक पाए हो
  मैं
 और कोई अन्य ही।
 सच तो ये है कि
 वह अकेला ही नहीं गुजरता
 बल्कि अपने साथ
 सब कुछ,
 
हाँ-हाँ ... ..... कुछ
 बदलते हुए गुजरता है।
 और तब,
 
बियावान जंगल में
 भटक गए प्राणी-सा
एकाकी मन,
 
चीत्कार करता है,
 
छटपटाता है
 हा-हाकार करता है।
 पर,
 
इससे आगे,
 
कर कुछ नहीं सकता,
 
क्योंकि,
 
यही प्रकृति का नियम है।
 इसलिए पुन: कहता हूँ कि
 तुम,
 
भूल तो सकते हो मेरे दोस्त
 कुछ समय के लिए,
 
उन शाश्वत सत्यों को
 पर,
 
नकार नहीं सकते!
 नकार नहीं सकते मेरे दोस्त,!!
 
नकार नहीं सकते!!!

रचना-2
यादें

भोर से दोपहर हुई, फिर शाम घिर आई
किस प्रतीक्षा मे खड़ी तुम पेड  की छाया
ये अदाऐं रुप सागर और तरुणाई
सामने ज्यों रति खड़ी हो धारकर काया
झुनन-झुनन पायल के घुंघरू की रूनझुन
बहक उठा मौसम भी जब गीत कोई गाया
दुखती रगों पर क्यों फिराती हो ये नाजुक कर
शूलों भरी है याद मेरी, और ये काया।

रचना-3

चाँद  तारे  तोड ़कर  लाने की  मत  बात  कर
ठोस धरती पर कदम रख, काम की कुछ बात कर।

जोड़ पाते जो नहीं ,दो जून रोटी भी,उन्हें
हो सके तो इक निबाला देने की कुछ बात कर।

प्यार के झूठे छलाबों ने दिया क्या आज तक
वासना से मुक्त जो, उस नेह की कुछ बात कर।

आदमी ही आदमी का बन गया दुश्मन यहाँ
बीज नफरत के मिटें,ऐसी भी कुछ बात कर।

तोड़ मत पायदान, चढ़कर सीढ़ियाँ ऊँची स्वयं
पंगु भी चढ़ जाय गिरि,ऐसी भी कुछ बात कर।


रचना-4

पतझर के पत्तों सी 
बिखर गई जिन्दगी।

आस्था के बोए थे बीज
सद्गुण तरु अभीप्सा से
उग आईं बैशम्य की 
विशाल डाल डहडही।

कण-कण तृण जोड़ते
अभिलक्ष्य की जुगाड़ में 
अस्ताचल थके पाॅव
मर्माहत    वन्दगी ।

आहत पिन कुशन सा
हर दर्द सोखता रहा
विगलित अरमानों की 
अनुंगूंज शेष रह गई।

कहाँ छिप गये हो
सिद्धान्तों के मूल उत्स
आलोडित मन में अब
बजती ये दुंदुभी।

रचना-5
हाइकु-

1. नेक नीयती
खुशबू गुलाव की
स्वयं फैलतीं।

2. ईश्वर था वो
तकदीर ही भोगी
माता पिता ने।

3. क्यों माॅगता मैं
उसे क्या पता नहीं
हर दिल की।

4. बे-पहचान
अपने ही घरमें
आज इंसान।

5. जितना झुका
सबकी नजरों में
उतना चढ़ा।

6. नैनों की कोर
भीगीं तो बोलीं बोल
बिन बोले ही।

7. मन की व्यथा
हॅसके सुनें सब
कोई न बाॅंटे।

8. क्यों रिरियाते
सब कुछ तय है
नहीं जानते?

9. बरसे मेघ
तृप्त हुई धरती
हरषे वृक्ष।

10. कभी न कभी
पुष्पित होता बांस
रख विश्वास।

रचना-6

हर शहर से एक सी बू आ रही है दोस्तो
सभ्यता इंसानियत को खा रही है दोस्तो।
भूख उदरों की बढ़ी कुछ दानवी ऐसी यहाँ
प्रेम को ही भूख निगले जा रही है दोस्तो।
रेंगती लाशों को तकते चील-कौवे -गिद्ध
मुर्दनी कुछ इस तरह से छा रही है दोस्तो।
हाथ मिलते,शीश झुकतंे,नम्रता का वेश है
किन्तु दिल से बद्दुआ ही आ रही है दोस्तो।
आदमी की जात को तुमने समझ रक्खा है क्या
जात पशुओं की भी अब घबरा रही है दोस्तो।

          रचना-7

मैं लिए तुम्हारी आस यहाँ बैठा हूँ।
मरुथल सी जलती प्यास जगा बैठा हूँ
डाली से टूटे हुए एक पत्ते सा।
जनमों से ठहरे पतझर की ऋतु जैसा
फिर से बसन्त की आस लिए बैठा हूँ।
अपने नीड़ों की ओर उड़ चले पंछी
घिरती रजनी के स्वर में बजती बंसी
मैं लिए पीर संत्रास यहाँ बैठा हूँ।
घर-बाहर एक सरीखा सूनापन है
मन पल-पल किसी प्रतीक्षा में उन्मन है
मैं जीवन को सन्यास बना बैठा हूँ।

रचना-8

जय हो जय हो ,तेरी जय हो
             सीमा पर तैनात सिपाही,तेरी जय हो।
माता जन्म-दात्री माता
उसका ऋणी रहा संसार
लाज दूध की रख जो पाता
गाता यश उसका संसारं
मातृ-भूमि का कर्ज चुकाना
ऐसा दृढ़ निश्चय   हो।
कीर्ति उसी की जग गाता है
जो न कभी फेरे मुँह रण से
हर मौसम भावन आता है
बढ़ते जो नित मिलकर प्रण से।
दिखला देते जौहर अपने
चाहे कोई वय हो।
तेरे ही बल पर सोते हैं
हो    निश्चिंत देशवासी
खिलते उपवन,महके बगिया
होती सबकी दूर उदासी।
रहते खड़े निडर, हिमगिरि से
चाहे कोई भय हो।
     

बाल-कविता   

रचना-1

सूरज


मैं हूँ सूरज भोर का
दुश्मन हूँ तम घोर का।
रोज सबेरे आता हूँ
अपना फर्ज निभाता हूँ
किरणों के तीखे भाले से
तम को मार भगाता हूँ
कलियाँ खिलतीं फूल बिहँसते
चिड़ी चहकती शोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।
ठीक समय पर पहुँचा करता
नहीं बहाना करता हूँ
सर्दी-गर्मी या वर्षा हो
नहीं किसी से डरता हूँ
बर्फ गिरे, आँधी आये या
आये तूफां जोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।
बच्चो ! कभी नहीं कम होने
देना अपने साहस को
और कभी मत पास फटकने
देना अपने आलस को
फिर मेरी ही तरह तुम्हारा
स्वागत होगा जोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।

                       बाल-कविता                    

रचना-2 

 चन्दामामा

चन्दा मामा, चन्दा मामा
मुझको बहुत सताते हो
तकती रहती राह तुम्हारी
नहीं समय पर आते हो।

इतने बड़े हो गये फिर भी
शरम नहीं तुमको आती
आते हो तुम रोज देर से
राह देख मैं सो जाती।
तारों की इस महासभा के
तुम प्रधान बन जाते हो....।

भैया मुझसे रोज पूछता
चाँद कहाँ पर रहता है
क्या खाता है, क्या पीता है
शीत-घाम क्यों सहता है?
कभी चाँद के गाल फूलकर
कुप्पा से हो जाते हैं
कभी पिचक कर रोटी के 
टुकड़े जैसे रह जाते हैं।
भैया की इस अबुझ पहेली,
में क्यों हमें फँसाते हो?...

क्या तुमने भी नेताओं की
तरह घोटाले कर डाले
इसीलिए क्या लगा रखे हैं
अपने होठों पर ताले?
क्या तुमने भी स्विस बैंक में 
अपना खाता खोला है
कहाँ छुपा रक्खा है मामा
टाॅफी वाला झोला है?
छूपे-छुपे क्यों घूम रहे हो
क्यों इतना घबराते हो?........

नहीं किया घोटाला मैंने
नहीं कहीं खाता खोला
दूर हो गया हूँ मैं तुमसे
जब से मनुज मुझ पर डोला
मुझको जब से मानव ने 
कंकड़-पत्थर का बतलाया 
बच्चों मैंने उस दिन से ही
नहंी अभी तक कुछ खाया।
तुमको मैं अच्छा लगता हूँ
मुझको भी तुम भाते हो।.....’’’

                      बाल-कविता                    

   रचना-3 

  रेलगाड़ी

नन्दू जी की गुड़िया बोली
आओ मिलकर खेलें खेल
हो जाते हैं खड़े इस तरह
बन जाती है लम्बी रेल।

खेल रहे हैं बच्चे खेल
छुक-छुक,छुक-छुक चलती रेल।

चिंकी-पिंकी, टिंकू डिब्बे
इंजन राजा भैया
राजुल गार्ड दे रहा सीटी
नाचे ता-ता थैया
डिब्बे बनकर, सब करते हैं
देखो कैसी धक्कम पेल।

नहीं तीसरा दरजा इसमें
नहीं है दरजा पहला
भेद-भाव से दूर बहुत है
कोई न नहला-दहला।

खेल-मेल की इस गाड़ी का
नाम रखा है चुनमुन मेल।
खेल रहे हैं बच्चे खेल
        छुक-छुक,छुक-छुक चलती रेल।
                       बाल-कविता                    

   रचना-4 

  होली

  हो हो हो हो  हैया रे
अब कैसा जाड़ा भैया रे।
आई बसन्त बहार है
फूलों की भरमार है
भीनी बहती ब्यार है
कहती कोयल सार है।
नहाओ गंगा मैया रे......
नाचो-कुदो मस्ती में
आई होली बस्ती में
झूमे टोली जत्ती में
कपड़े रख दो खत्ती में।
मस्त कुलांचें छैया रे........
लाओ पप्पू रंग गुलाल
गले मिलें सब बाल-गुपाल
महक उठे सब घर-चैपाल।

दुहो सबेरे गैया रे.........



बाल कहानी- आई वांट टू सी            डाॅ.दिनेश पाठक‘शशि’


        ‘‘बाबा,जरा अपना मोबाइल देना।’’-स्कूल से आते ही सक्षम ने कहा तो मैंने उसके चेहरे की ओर देखा। वह स्कूल का बैग अपने कमरे में रखकर सीधा मेरे पास चला आया था।
        ‘बेटा,पहले अपने स्कूल की ड्रैस उतार कर ,हाथ-मुँह धोलो।दूसरे कपड़े पहन कर कुछ खा-पी लो फिर मोबाइल मांगना। मैंने कहा तो सक्षम ने ‘‘हाँ’’ में गर्दन हिलाई और कपड़े बदलने अपने कमरे में चला गया। थोड़ी देर बाद जब सक्षम मेरे पास फिर आया तो उसका चेहरा एकदम तरोताजा लग रहा था।
         ‘‘बाबा, अब तो दे दो मोबाइल।’’-सक्षम ने कहा तो मैंने मोबाइल उसके हाथ में देते हुए उसे अपने पास ही बैठा लिया, यह देखने के लिए कि यह मोबाइल का क्या करेगा।
         मोबाइल को अपने बाँये हाथ में पकड़कर सक्षम ने अपने सीधे हाथ की तर्जनी उंगली से मोबाइल की स्क्रीन को छूआ और कुछ खोजने लगा। थोड़ी देर बाद मेरे चेहरे की ओर देखते हुए बोला,-‘‘बाबा, आपके मोबाइल में गेम्स कौन-कौन से हैं?’’
        ‘बेटा मुझे तो पता नहीं, इसमें गेम्स भी होते हैं।’
       ‘‘अरे बाबा, आपको नहीं पता! इसमें सब तरह के गेम्स होते हैं। एयरोप्लेन रेस ,ट्रेन रेस , आर्मी ट्रक रेस, लूडो ,साँप-सीढ़ी और कार रेस भी। और भी बहुत सारे गेम्स।’’-उसने बहुत सारे गेम्स के नाम गिना दिए।
        ‘अच्छा !,मुझे तो पता ही नहीं था।’-मैंने आश्चर्य प्रकट किया,-‘ तुमको कौन सा गेम सबसे अच्छा लगता है?’
        ‘‘मुझको, मुझको कार रेस में बहुत आनन्द आता है बाबा। दिखाऊँ आपको?’’
        ‘हाँ-हाँ, दिखाओ, मैं भी तो देखूँ तुम्हारी कार रेस।’- मैंने उसे उत्साहित किया।
        सक्षम ने अपने बाँए हाथ में मोबाइल को पकड़े-पकड़े ही सीधे हाथ के अंगूठे और तर्जनी उंगली की सहायता से मोबाइल का प्ले स्टोर खोला और उसमें से एक सुन्दर सी कार चुनकर ,कार रेस का गेम इनस्टाॅल करने लगा। गेम इनस्टाॅल होते ही उसने सीधे हाथ और बाँए हाथ के अंगूठे की सहायता से कार को दौड़ाना शुरू कर दिया। दांए, बांए और सामने के अवरोधों से कार को बचाने के लिए वह अपने दोनों हाथों के अंगूठों को मोबाइल की स्क्रीन पर बने आइकनों (बटनों) पर बहुत तेजी से चला रहा था।
       ‘‘बाबा, आज तो गाने सुनने का मन कर रहा है।’’-अगले दिन स्कूल से आकर सक्षम ने मेरे पास बैठते हुए इच्छा प्रकट की।
       ‘सुन लो बेटा, नीचे के कमरे में स्टीरियो रखा है। चलो चला देता हूँ।’-मैंने उठते हुए कहा।
       ‘‘नहीं बाबा, स्टीरियो से नहीं , आपके मोबाइल में से सुनने हैं गाने।’’-उसने मेरा मोबाइल लेने के लिए अपना हाथ आगे किया तो मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा,-‘‘अच्छा तो गेम्स की तरह ही मोबाइल में अब गाने भी आने लगे क्या?’
       ‘‘और नहीं तो क्या। आप जो भी गाना सुनना चाहो, वही गाना सुन सकते हो।’’
       ‘अरे वाह, ये तो बहुत अच्छी जानकारी दी तुमने।’-मेरा भी आश्चर्य बढ़ता जा रहा था,-‘और क्या-क्या चीज मोबाइल में देख-सुन सकते हैं?’
       ‘‘बताऊँ बाबा? आप कोई सी भी जानकारी प्राप्त करना चाहो जैसे किसी की कोई पुस्तक पढ़ना चाहो, किसी के बारे में जानना चाहो, तो भी पढ़ सकते हो और देख सकते हो। इतना ही नहीं बाबा, आप कोई सा कार्टून देखना चाहो तो वह भी मोबाइल से देख सकते हो और तो और अगर आप अपनी गाड़ी से कहीं जा रहे हो और आपको वहाँ पहुँचने का रास्ता नहीं मालुम तो आपका मोबाइल आपको रास्ता बताता चलेगा कि अब आपको किधर को मुड़ना है किधर को चलना है।’’
       ‘अच्छा !’-मैंने आश्चर्य प्रकट किया तो सक्षम प्रसन्नता से झूम उठा और बोला,-‘‘आपको यह सब नहीं पता था न बाबा?’’
       ‘हाँ बेटा, मैं तो पहली बार सुन रहा हूँ यह सब तुम्हारे मुँह से। पर यह सब कुछ तुमने किससे सीखा और जाना?’
       ‘‘मैंने सीख लिया बाबा, मम्मी-पापा के मोबाइल से सीख लिया। आपको भी बताऊँ?’’-खुशी से नाचते हुए सक्षम ने मोबाइल मेरे हाथ से ले लिया और अपने सीधे हाथ की तर्जनी उंगली से मोबाइल की स्क्रीन को ऊपर से नीचे की ओर स्लाइड करने लगा। उसके बाद इण्टरनैट व वाई-फाई चालू करने लगा। मैं अनजान बना उस छह वर्ष के बच्चे को यह सब करते हुए आश्चर्य चकित हो देख रहा था और वह अपनी धुन में मस्त गूगल प्ले पर अपना अंगूठा रखकर कह रहा था-‘‘आई वाण्ट टू सी मोटू-पतलू कार्टून।’’


बाल कहानी-    दिल्ली की सैर                    डाॅ.दिनेश पाठक‘शशि’
                      

        अपने स्कूल जाने की तैयारी करते हुए सक्षम ने मेरी ओर देखा और पूछ बैठा-‘‘बाबा, आप इतनी जल्दी कहाँ जाने की तैयारी करने लगे आज?’’
      ‘मैं? मुझे आज दिल्ली जाना है बेटा। दिल्ली से आपको कुछ मंगाना है क्या?’
‘‘नहीं बाबा, मेरे पास तो सब कुछ है, आप बस जल्दी लौट आना। शामको खेलेंगे।’’-स्कूल ड्रैस पहनते हुए उसने मेरी ओर देखा फिर जैसे उसे कुछ याद आया, वह उत्साहित होते हुए बोला,-‘‘ आप दिल्ली जा रहे हो न? तो ऐसा करना कि वहाँ प्लेनेटोरियम भी देख आना। बहुत आनन्द आयेगा आपको।’’
      ‘अच्छा! ये प्लेनेटोरियम क्या होता है बेटा?’-मैंने अनजान बनते हुए उससे प्रष्न किया तो वह चंचलता से मेरी ओर देखकर मुस्कराने लगा,-‘‘बाबा, आपको नहीं पता प्लेनेटोरियम क्या होता है?’’
      ‘हाँ बेटा,क्या होता है प्लेनेटोरियम, आपको पता है क्या?’
      ‘‘बाबा, आपको तो कुछ नहीं पता।’’-अपने बाँए हाथ की हथेली पर सीधे हाथ की हथेली मारते हुए सक्षम मुस्कराया,-‘‘प्लेनेटोरियम यानि कृत्रिम सौर ऊर्जा मण्डल । पता है बाबा, एक बड़े से हाॅल में सूरज,चन्द्रमा,सितारे और बहुत से उपग्रह दिखाये जाते हैं।’’
      ‘अच्छा! सूरज,चन्द्रमा और बहुत से उपग्रह भी? लेकिन ये सब एक बड़े हाॅल में कैसे आ सकते हैं भला।‘- मैंने आष्चर्य प्रकट करते हुए सक्षम की ओर देखा तो वह और उत्साहित होकर बोला,-‘‘हाँ बाबा, लगता है आपको तो सचमुच कुछ नहीं पता। आपको आपके टीचर जी ने नहीं पढ़ाया था इसके बारे में? देखो मैं बताता हूँ आपको। जब आप दिल्ली पहुँच जाओ न तो किसी अंकल से पूछ लेना कि मुझे प्लेनेटोरियम देखने जाना है, वो रास्ता बता देंगे। और नही ंतो ऐसा करना बाबा कि आप न स्टेषन से ही आॅटो कर लेना। ठीक है न बाबा? जब आप प्लेनेटोरियम पहुँचेंगे न तो पहले आपको टिकट विंडो से अपनी टिकट लेनी पड़ेगी। पता है बाबा, उस टिकट पर आपके बैठने की सीट नम्बर लिखी होगी। आप उस हाॅल के अन्दर घुसकर अपनी सीट पर बैठ जाना। ठीक है? फिर टार्च जलाकर एक अंकल आयेंगे जो सबकी टिकट चैक करेंगे। आप उनको अपनी टिकट दिखा देना। ठीक है बाबा?’’-सक्षम लगातार बताये जा रहा था तभी मैंने बीच में टोक दिया,-
‘हाँ, ये सब तो ठीक है, पर वो जो मैंने पूछा था कि उस हाॅल के अन्दर चन्द्रमा,सितारे और अन्य उपग्रह .....वो सब कैसे आ सकते हैं, वो बात तो बताओ।’
      ‘‘बाबा...वही तो बता रहा हूँ। आप बस सुनते जाओ। आप बार-बार टोकेंगे तो मुझे स्कूल के लिए देर हो जायेगी और बाबा, आपकी गाड़ी भी छूट सकती है। समझे?
      ‘समझ गया बेटा,अब फिर आप जल्दी से बता दो।’-मैंने उस नन्हे नाती की चपल बातें सुनकर मन ही मन मुस्कराते हुए चुटकी ली।
      ‘‘देखो जब सब लोग अपनी-अपनी सीट पर बैठ जायेंगे न, तो उस हाॅल में अंधेरा हो जायेगा और फिर प्रोजेक्टर चालू हो जायेगा।’’
      ‘प्रोजेक्टर !ये प्रोजेक्टर कहाँ से बीच में आ गया अब? आप तो ग्रह-उपग्रह की बात बताने जा रहे थे ।’
      ‘‘देख लो फिर से टोक दिया बाबा।’’-सक्षम तिरछी नजर से मेरी ओर मुस्कराया,-‘‘मैं वही तो बता रहा हूँ आपको। ये जो प्रोजेक्टर होता है न, इसी में से सभी ग्रह-उपग्रह यानि प्लेनेट निकलकर स्क्रीन पर दिखाई देते हैं। अब समझ गये न बाबा?’’
      ‘नहीं समझा।’-मैंने अज्ञानता प्रकट करते हुए कहा तो सक्षम ने अपने सीधे हाथ की चारों उंगलियों को अपने मांथे पर हल्के से मारते हुए मेरी ओर देखा,-‘‘ओफ्फो, बाबा आपने हाॅल के अन्दर कभी मूवी देखी है?’’
      ‘हाँ, देखी तो है।’
      ‘‘तो फिर आप ये समझ लो कि जैसे पिक्चर हाॅल में सामने लगी स्क्रीन पर जो मूवी दिखाई देती है, वह प्रोजेक्टर से ही तो चलाते हैं। ऐसे ही प्लेनेटोरियम का जो प्रोजेक्टर होता है न बाबा, वह थोड़ा अलग तरह का होता है। उसमें सभी प्लेनेट अलग-अलग दिषाओं में घूमते हुए दिखाई देते हैं। बिल्कुल सचमुच के आसमान की तरह। बहुत आनन्द आता है बाबा, आप देखना।’’
      ‘अच्छा!’
      ‘‘हाँ, आप जरूर देखना। और एक और मजेदार बात बताऊँ बाबा?’’
      ‘हाँ-हाँ बताओ।’’
      ‘‘जैसे ही उस हाॅल के अन्दर अंधेरा होता है न और रात का सीन चालू होते ही तारे टिमटिमाने लगते हैं तो बहुत सारे लोग तो देखते ही देखते , रात समझ कर सो जाते हैं अपनी कुर्सियों पर।’’
      ‘अच्छा आप भी सो गये थे क्या?’
      ‘‘नही ंतो.....।’’-सक्षम ने षरमाते हुए तिरछी नजर से मेरी ओर देखा फिर षरारत से बोला,-‘‘हाँ आप भी मत सो जाना बाबा।’’
      ‘ठीक है, नहीं सोऊंगा। प्लेनेटोरियम देखने के बाद फिर और क्या चीज देख्ूँा?’-मैंने सक्षम को कुरेदा तो अपने मोजा पहनते हुए मेरी ओर देखने लगा,-‘‘जब आप प्लेनेटोरियम देख लो और आपके पास टाइम और हो बाबा तो फिर आप ऐसा करना कि रेल म्यूजियम भी देख आना।’’
      ‘रेल म्यूजियम भी है दिल्ली में?’
      ‘‘और नही ंतो क्या। इसका मतलब ये हुआ बाबा कि अभी तक आपने रेल म्यूजियम भी नहीं देखा है।’’
      ‘हाँ बेटा, देखा तो नहीं है। आपने देखा है? क्या होता है रेल म्यूजियम में?’-मैंने धीरे से मुस्कराते हुए उसकी ओर देखा। मेरी अज्ञानता पर सक्षम ठहाकर हँस पड़ा,-‘‘उल्लू बना रहे हो मुझको।’’
      ‘नहीं बेटा, उल्लू नहीं बना रहा। सच्ची-मुच्ची में नहीं देखा।’
      ‘‘बाबा........ मैं फाइव ईयर्स का हूँ तो भी मैंने दिल्ली में इतनी सारी चीजें देख लीं और इसका मतलब ये हुआ कि आप अपने मम्मी-पापा के साथ कहीं जाते ही नहीं थे क्या? या आप षरारत करते थे इसलिए आपके पापा आपको कहीं ले नहीं जाते थे?’’
      ‘हाँ बेटा, अब आप बता दो तो देख आऊंगा।’-मैंने उसे उकसाया तो उत्साह में भरकर वह बताने लगा-‘‘देखो बाबा, जब आप रेल म्यूजियम देखोगे न, तो एकदम हैरान रह जाओगे। रेल म्यूजियम में स्टीम,डीजल और इलैक्ट्रिक सभी तरह के बहुत बड़े-बड़े और असली इंजन रखे हुए हैं। और बाबा, बहुत सारे तरह-तरह के स्टेषन भी दिखाई दे्रगे।’’
      ‘अरे वाह, फिर तो आनन्द आ जायेगा।’
      ‘‘हाँ, और बताऊँ बाबा? वहाँ पर टाॅय ट्रेन और जाॅय ट्रेन भी हैं जो चलती भी हैं। इतना ही नहीं , रेल म्यूजियम में क्विज भी है। अगर आप सारे गेम्स के सही-सही जबाव दे दोगे न, तो आप जीत जाओगे। ठीक है बाबा, जीत कर आओगे न? प्रोमिज ।’’
      ‘हाँ बेटा, प्रोमिज।’
      ‘‘ठीक है बाबा, अब मैं स्कूल जाता हूँ। फिर कभी आपको और ढेर सारी बातें बताऊँगा।’’-मेरी तरफ देखते हुए सक्षम ने सबके पैर छूए और अपने स्कूल-वाहन में बैठ गया।
’’’


बाल कहानी-             भविष्य के लिए                डाॅ.दिनेश पाठक‘शशि’


‘‘कल को मेरे दादू आने वाले हैं।’’-यह बात धैर्य सुबह से कई साथियों को बता चुका है। उसकी प्रसन्नता छलकी पड़ रही है। दादू के आने पर वह रात को उनसे ढेर सारी कहानियाँ सुनेगा। उनके साथ गपशप करेगा और खूब मस्ती भी करेगा।-‘‘मम्मी दादू कितने दिन की छुट्टी आ रहे हैं?’’- अपनी खुशी प्रकट करते हुए धैर्य ने पूछा।
‘पूरे एक महीने की।’-मम्मी ने कहा तो वह प्रसन्न होकर उछलने लगा,-‘‘अहा जी,एक महीने तक दादू के साथ मस्ती करने को मिलेगा अब तो । वह भी अपने पापा के साथ, दादू को लेने स्टेशन आ गया।
घर पहुँचकर धैर्य दादू की गोद में चढ़कर बैठ गया तो मम्मी ने डाँट दिया,-‘पहले दादू को हाथ-पैर धोकर, कपड़े बदलकर तसल्ली से बैठने तो दे, फिर चढ़ना गोद में।’
मँा की डाॅट खाकर धैर्य ने मुँह फुला लिया और दादू की गोद से उतरकर अपने कमरे में जाकर रोने लगा। पापा ने देखा तो उससे रोने का कारण पूछा। रोते-रोते ही वह बोला कि मम्मी मुझे दादू के साथ नहीं बैठने दे रहीं।
नहीं धैर्य, मम्मी ने तुमको दादू के साथ बैठने से मना नहीं किया है। उन्होंने तो केवल इतना कहा है कि दादू यात्रा से हारे-थके आये है।, उन्हें हाथ-मुँह धोकर कपड़े बदल लेने दो,नाश्ता-पानी कर लेने दो, उसके बाद उनसे खूब बात करना।
‘नहीं पापा,मम्मी ने ऐसे नहीं कहा। उन्होंने तो मुझे डाॅटा।’-कहकर वह कमरे के कोंने में खड़ा होकर और जोर से रोने लगा।
दादू ने सुना तो उठकर आये और धैर्य को समझाकर अपने साथ ड्राइ्रग रूम में ले आये।
‘‘दादू कल मेरे स्कूल में पेरैण्ट्स मीटिंग है। आप चलोगे?’’
‘मैं क्या करूँगा वहाँ जाकर। अपने मम्मी-पापा को ले जाना।’
‘‘आप भी चलना न दादू।’’-धैर्य ने मनुहार की।
‘हाँ पापाजी,धैर्य ठीक कह रहा है।कल मुझे भी अपने दफ्तर जल्दी जाना है और इसके पापा को भी। तो ऐसा कर लीजिए न कि धैर्य को लेकर आप ही इसके स्कूल चले जाइयेगा, नही ंतो  ंहम दोनों में से किसी एक को छुट्टी लेनी पड़ेगी।’
‘मैंने तो इसका स्कूल देखा भी नहीं है।’- दादू के बोलते ही धैर्य तपाक से बोल पड़ा,-‘‘कोई बात नहीं दादू। मैं बता दूँगा न।’’-धैर्य की बात सुनकर दादू हँस पड़े,-‘ठीक है, मैं ही चलूंगा तेरे स्कूल।’
धैर्य की मम्मी ने धैर्य की क्लासटीचर से क्या-क्या कहना है, ये सारी बातें दादू को समझाईं और फिर किचिन में घुसकर उनके लिए चाय-नाश्ता बनाने लगीं।
दादू के कुछ भी बोलने से पहले ही, धैर्य को देखते ही उसकी क्लासटीचर ने शिकायतों की गठरी खोलकर रख दी,-‘धैर्य क्लास में ऊधम बहुत मचाता है। होमवर्क पूरा करके नहीं लाता।क्लास में भी अपना कार्य नहीं करता आदि...आदि।
क्लासटीचर की बातें सुनकर तो दादू, धैर्य की मम्मी द्वारा बताई गई सारी बातें ही भूल गये। उनका नाती ऐसे उनका नाम नीचा करेगा, ऐसी तो उन्हें उम्मीद भी नहीं थी। उन्हें धैर्य पर बहुत गुस्सा आने लगा पर उन्होंने उससे स्कूल में कुछ नहीं कहा। घर आकर उन्होंने धैर्य को एक कमरे में बुलाकर, होमवर्क न करने का कारण पूछा तो धैर्य ने तपाक से उत्तर दिया-‘‘दादू, टाइम ही नहीं मिलता।’’
स्कूल से लौटकर धैर्य ने टी.वी.आॅन किया और मोटू-पतलू कार्टून देखने लगा। तीन-चार घण्टे तक टी.वी.देखने के बाद धैर्य ने अपनी साईकिल उठाई और घर से बाहर सड़क पर साईकिल दौड़ाने लगा। अंधेरा हो जाने पर भी वह स्ट्रीटलाइट में अपनी साईकिल से इधर से उधर दौड़ता रहा।दफ्तर से आकर धैर्य के पापा ने उसे आवाज दी और उससे होमवर्क आदि के बारे में पूछा तो वह काॅपी-किताब लेकर पढ़ने बैठ गया। इसी बीच उसकी मम्मी आ गई और उन्होंने अपना पसन्दीदा सीरियल टी.वी.पर चालू कर दिया।
दादू ने ध्यान से देखा कि धैर्य अब पढ़ाई कम, टी.वी.सीरियल में अधिक ध्यान दे रहा था।
सीरियल खत्म होने पर मम्मी ने सभी को खाना बनाकर खिलाया और दूध दिया। पापा ने इस बीच अपने पसन्द की मूवी टी.वी पर चला ली थी। धैर्य भी अब मूवी देखने लगा था और मूवी पर बीच-बीच में अपने कमैण्ट्स दे रहा था। रात के ग्यारह बजने को थे। दादू को अब नींद आने लगी थी। वे अपने बिस्तर पर सो गये।
सुबह पाँच बजे ही दादू फ्रैश होकर माॅर्निंग वाॅक के लिए जाना चाहते थे। उन्होंने धैर्य को भी साथ चलने के लिए आवाज दी लेकिन धैर्य के साथ-साथ उसके मम्मी-पापा भी अभी सोये हुए थे तो वे अकेले ही घूमने निकल गये।
शाम को स्कूल से आकर धैर्य ने कपड़े चेंज करके हाथ-मुँह धो लिए तो दादू ने उसे दूध-जलेबी खाने को दिए और फिर अपने पास बैठाकर सुबह माॅर्निंगवाॅक की बात बताने लगे जिसमें उन्होंने कई मोर, तालाब और तालाब में तैरती बतखों को देखा था। धैर्य सुन-सुन कर आश्चर्य कर रहा था।-‘‘क्या सचमुच के मोर और बतख थे दादू?’’
‘और नही ंतो क्या। बिल्कुल पास से देखा था मैंने नाचते हुए मोर को।सुन्दर-सुन्दर पंखों वाला। प्यारा सा।’
‘‘ और बतख?’’-धैर्य का आश्चर्य बड़ता जा रहा था।
‘बतख तो पानी में लाइन लगाकर तैर रही थीं। बहुत सुन्दर थीं। उनके बच्चे भी तैर रहे थे।’
‘‘अच्छा!तो मुझे भी देखना है ये सब।’’-धैर्य ने दादू के कंधों पर अपने हाथ रखकर उचकते हुए कहा।
‘ठीक है, मैं जैसे बताऊँ वैसे करते चलो तो सुबह को तुमको भी लेता चलूँगा।’
‘‘ओ.के.दादू, डन। बोलो क्या करूँ मैं?’’- कंधों पर से हाथ हटाकर दादू के सामने आते हुए धैर्य बोला।
‘देखो मैंने तुम्हारे लिए ये चैबीस घण्टे का टाइम टेबिल बनाया है। तुमको इसके अनुसार ही काम करना होगा -सुबह को पाँच बजे जागना। साढ़े पाँच बजे तक पोटी,ब्रश व जीभी करके माॅर्निंग वाॅक के लिए निकलना। छह से साढ़े छह तक नहाना और नाश्ता करना।पौने सात बजे स्कूल को जाना। फिर स्कूल से लौटकर ढाई बजे तक कपड़े चेंज करना,फ्रैश होना और दूध पीना। आधा घंटा आराम और गपशप फिर तीन से साढ़े पाँच बजे तक स्कूल वर्क, होम वर्क और सुलेख। साढ़े पाँच से सात बजे तक साईकिल चलाना व खेलकूद फिर रात का खाना खाकर कल के लिए स्कूल बैग तैयार करना,जूते-मोजे और पानी की बोतल आदि को सही जगह पर रखकर साढ़े आठ से साढ़े नौ तक दादू से कहानियाँ सुनना और फिर सो जाना।’
‘‘लेकिन मेरे कार्टून देखने का तो इसमें कोई समय ही नहीं दिया आपने। मैं कार्टून कब देखूंगा।’’-धैर्य रुँआसा हो आया।
‘कार्टून के लिए इतवार के दिन का अलग से टाइमटेबिल है बेटा। रात को धैर्य को अपने पास ही सुला लिया दादू ने। सोने से पहले उनसे प्रहलाद की, ध्रुब की और एकलब्य की कहानियाँ सुनकर उसे बहुत अच्छा लगा।
रात को साढ़े नौ बजे ही सो जाने के कारण धैर्य ,दादू के जगाने पर सुबह को पाँच बजे ही जाग गया क्योंकि आज वह पूरे सात घंटे सोया था अतः उसकी नींद भी पूरी हो गई। अन्य दिनों में तो वह रात ग्यारह बजे तक टी.वी.के आगे ही बैठा रहता था और इसलिए नींद भी पूरी नहीं हो पाती थी।
फ्रैश होकर जब टाइम टेबिल के अनुसार वह दादू के साथ माॅर्निंग वाॅक पर गया तो उसने अपने सुन्दर पंखों को फैलाकर कई मोरों को नांचते देखा। उसका मन किया कि वह एक मोर के ऊपर बैठकर आनन्द ले। तालाब में तैरती बतखों व उनके बच्चों को तैरते देखकर तो धैर्य खुशी से ताली बजाने लगा।आज माॅर्निंगवाॅक में बहुत आनन्द आया, प्रसन्न होते हुए वह सारी बातें अपने मम्मी-पापा को बताने लगा।
टाइमटेबिल के अनुसार चलने पर अब कुछ ही दिनो बाद उसे स्कूल में टीचर की पिटाई भी नहीं खानी पड़ती। वह अपना सारा काम समय पर करके जो ले जाने लगा है। 
बहू, अब आप दोनों को भी धैर्य के भविष्य के लिए अपने टी.वी.सीरियल देखने और सोने-जागने का टाइम टेबिल बदलना होगा।’- दादू ने धैर्य के मम्मी-पापा को पास बैठाकर समझाते हुए कहा।
’’’


बाल कहानी- समाधान डाॅ.दिनेश पाठक‘शशि’
‘‘बाबा  ...बाबा बचाओ...’’ ंकी चीख सुनकर मैं कम्प्यूटर पर काम करना छोड़कर नीचे दौड़ पड़ा।जीने की सीढ़ियाँ उतरते-उतरते मेरे दिल की धड़कन बहुत तेज हो गई थी। नीचे जाकर मैं सक्षम के पास पहुँचा तो मुझे देखते ही वह दौड़कर मुझसे चिपक गया,-बाबा .....बाबा मुझे बचा लो।’’ उसकी आँखों में भय मिश्रित निरीहता टपक रही थी और वह थर-थर काँपते हुए मुझसे चिपका जा रहा था। सामने रौद्ररूप धारण किए निशा हाथ में पकड़ी डण्डी को लपलपा रही थी।
‘‘क्या हुआ बेटी, इस बच्चे को इस तरह क्यों पीट रही हो? क्या गलती कर दी इसने?’’- मैंने सक्षम की मम्मी, निशा की ओर देखा तो उसने हाथ की डण्डी को सक्षम की ओर लहराते हुए क्रोध से फुंकारते हुए कहा,-‘‘इसी से पूछ लो पापा जी, क्या गलती र्की है।’’
अब मैंने सक्षम को अपने आप से लिपटाते हुए और अपने सीधें हाथ से उसके सिर को सहलाते हुए उसके चेहरे की ओर देखा,-‘‘ हाँ बेटू, आप ही बताओ, क्या गलती की है आपने?’’
आँखों से आँसू बहाते हुए सक्षम ने ऊपर को नजर उठाई,-‘‘बाबा मैं क्लास वर्क करके नहीं ला पाया।’’
‘‘अरे रे! क्लास वर्क करके क्यों नहीं लाया मेरा बेटा? ये तो बहुत बुरी बात हो गई,क्यों?’’-सक्षम के सिर पर हाथ फेरते हुए मैंने पूछा तो सक्षम ने कोई उत्तर नहीं दिया तो मैंने एक बार फिर से अपना प्रष्न दोहराया। सक्षम फिर भी मौन रहा तो उसकी मम्मी चीख पड़ी,-‘‘अब आप ही  देख लीजिए पापाजी । इसने मुझे परेशान करके रख दिया है। एक भी दिन स्कूल का काम पूरा करके नहीं लाता। पूछो तो कोई न कोई बहाना बना देता है। अब मैं कब तक दूसरे बच्चों की काॅपियाँ माँग-माँग कर इसका क्लास वर्क पूरा कराऊँ? इसने तो मेरी नाँक में दम करके रख दिया है।’’-निशा लगातार बोले जा रही थी और सक्षम सहमा सा निरीहता से मेरे चेहरे की ओर देखे जा रहा था जिसे देखकर मेरा हृदय पसीज रहा था।
मैं ऐसे में अपने आप को बड़ी दुविधा की स्थिति में पा रहा था। सक्षम के साथ निशा कितनी मेहनत करती है,मुझे सब पता था। सुबह जागने से लेकर रात सोने तक वह सक्षम को एक मेधावी छात्र बनाने की पुरजोर कोषिष में लगी रहती है फिर भी सक्षम को अपने अनुरूप चलता न देखकर , वह खीज उठती है। खीज जब सीमा से पार हो जाती है तो फिर वह थप्पड़, घूंसा और डण्डी से बेरहमी के साथ सक्षम की पिटाई करना षुरू कर देती है। आज भी वही हुआ। आज उसका ये रौद्ररूप देखकर मैं भी सहम गया।      
     मैंने शान्तिपूर्वक उससे कहा,-‘‘देख बेटी तेरी इतनी मेहनत करने और बार-बार कहने के बावजूद सक्षम तेरे अनुरूप नहीं चल पा रहा तो कुछ तो गड़बड़ जरूर है।’’
‘‘कुछ गड़बड़ नहीं है पापाजी, ये पढ़ाई में ध्यान ही नहीं लगाता। दुनियाभर की बातें बनाने में तो सबसे आगे रहता है पर क्लास में क्या पढ़ाया-लिखाया जा रहा है, इसकी ओर ध्यान ही नहीं देता। सभी टीचर्स के षिकायत भरे फोन सुन-सुन कर मैं तो अब थक चुकी हूँ पापाजी। आप छोड़ दीजिए इसे, मैं आज इसकी हड्डी-पसली तोड़कर ही मानूँगी।’’-कहकर निशा ने हाथ में पकड़ी डण्डी को सक्षम की ओर लहराया तो वह डरकर मेरे षरीर से और ज्यादा सट गया।
सक्षम की कुशाग्रबुद्धि और वाक्पटुता से भी मैं खूब अच्छी तरह परिचित हूँ। आठ वर्ष का बच्चा जिस कुषलता से कम्प्यूटर,लैपटाप एवं मोबाइल के सारे फंक्शन्स जानता है और उनपर काम भी कर लेता है, इतना ही नहीं कैसिओ,गिटार और हारमोनियम बजा लेने के साथ-साथ अपनी मम्मी के साथ मधुर आवाज में फिल्मी गीतों को भी गाकर मुझे आश्चर्य चकित कर देता है। पर क्लास वर्क के लिए इस तरह राज-रोज अपनी मम्मी से मार खाना, उसका ये व्यवहार मुझे सोचने पर विव कर देता है।
मैंने निशा को समझाया,-‘‘बेटी, सक्षम का स्कूल वर्क आदि करके न लाना, मेरी भी समझ में नहीं आ रहा है। इतना होशियार बच्चा, क्यों ऐसा कर रहा है, कोई बात तो जरूर है इसके साथ।क्यों न कल इसके स्कूल जाकर पता किया जाय?शायद कुछ हल निकले।’’
‘‘कोई बात नहीं है पापाजी,ये दुनियाभर की बातों में लगा रहता है। पढ़ाई में ध्यान केन्द्रित नहीं करता। पढ़ते समय इसके दिमाग में दुनियाभर की बातें घूमती रहती है।’’
‘‘यही तो मैं भी कह रहा हूँ बेटी, कि पढ़ाई में इसका ध्यान केन्द्रित क्यों नहीं होता, इसका पता लगाना जरूरी है। अच्छा ऐसा करो, दो दिन बाद इतवार को मुरादाबाद से मेरे मित्र डाॅ.राकेश चक्र आ रहे हैं। वे योग व एक्यूप्रेशर के विशेषज्ञ हैं। बहुत सारे स्कूलों में जाकर वे विद्यार्थियों की अनेक समस्याओं को हल कर चुके हैं। क्यों न हम उनसे सक्षम के बारे में सलाह लें?’’
‘‘ठीक है पापाजी, मैं तो अब चीखते-चीखते थक चुकी हूँ।’’-कहकर निशा ने जैसे अपनी हार मान ली।
डाॅ.राकेशचक्र के आते ही सक्षम उनसे लिपट गया जैसे उन्हें बहुत वर्षों से जानता हो। निशा ने चाय सर्व करते हुए डाॅ.राकेश चक्र से सक्षम द्वारा स्कूल वर्क आदि  करके न लाने व पढ़ाई में ध्यान केन्द्रित न करने के सम्बन्ध में शिकायत की तो उन्होंने अपने बैग से  ऐक्यूप्रेशर जिमी निकाली और सक्षम के हाथ-पैर के कुछ बिन्दुओं पर दबा-दबा कर देखने लगे। दोनों हथेलियों व दोनों पैरों के तलबों के बीचोबीच ऊर्जा केन्द्रों पर जिमी से दबाते ही सक्षम दर्द से उछल पड़ा साथ ही चारों हाथ-पैर के अँगूठों के अग्रभाग में यानि मस्तिष्क बिन्दुओं पर दबाने पर भी उसने दर्द महसूस किया तो डाॅ.राकेश चक्र समझ गये कि समस्या कहाँ है और क्या है। उन्होंने समझाया कि जब भी किसी का ऊर्जा केन्द्र शिथिल हो जाता है, वजन बढ़ने लगता है और  मस्तिष्क में विकार उत्पन्न होने लगते हैं तो ऐसी स्थिति में बच्चे का ध्यान एक जगह केन्द्रित नहीं हो पाता है। वह आलतू-फालतू बातों में भटकना शुरू हो जाता है। ऐसा ही सक्षम के साथ हो रहा है। बच्चा बहुत होशियार है। ऐसे बच्चों की मारने-पीटने से समस्या बिल्कुल भी हल नहीं होती।
डाॅ.राकेष चक्र की बात सुनकर निशा तो घबरा ही गई,-‘‘क्या कह रहे हैं अंकल? फिर क्या उपाय है इसका?’’
इसका  और इसके जैसे अनेक बच्चों का भी एकमात्र उपाय ये है कि इन्हें मारने-पीटने व इन पर चीखने-चिल्लाने की बजाय हथेलियों व पैर के तलवों के बीचोबीच स्थिति इनके ऊर्जा केन्द्रों व हाथ-पैर के चारों अँगूठों के अग्रभाग में स्थित मस्तिष्क केन्द्रों के बिन्दुओं को नियमित 15-20 दिन तक सहानुभूतिपूर्वक,धैर्य के साथ  ऐक्यूप्रेशर यंत्र जिमी से या हाथ के अँगूठे से धीरे-धीरे दबाया जाय। एक महीने में ही इसका ध्यान पढ़ाई में इतना केन्द्रित हो जायेगा कि फिर किसी शिकायत का मौका ही नहीं मिलेगा।
‘‘देखती हूँ अंकल।’’-कहते हुए निशा किचिन में घुस गई और दोपहर का भोजन बनाने लगी।डायनिंग टेबिल पर सभी का भोजन लगाने के बाद उसने सबसे भोजन करने का आग्रह किया तो सक्षम अपने भोजन की प्लेट उठाकर बैडरूम में चला गया और भोजन करते-करते टी.वी.पर कार्टून देखने लगा। डाॅ.चक्र ने देखा तो आवाज लगाई,-‘‘बेटा, भोजन करते समय टी.वी. नहीं देखते।’’
‘‘लेकिन बाबा, मम्मी तो भोजन करते समय रोजाना ही टी.वी. सीरियल देखती हैं।’’-सक्षम की बात सुनकर निशा ने उसकी ओर आँख तरेरी तो डाॅ.चक्र बीच में ही बोल पड़े,-‘‘बेटी, बच्चा वही करता है जो वह बड़ों से सीखता है,उन्हें करते देखता है इसलिए बच्चों वाले घरों में बड़ों को भी अपना व्यवहार सौम्य-शालीन और सही रखना जरूरी है तभी वे बच्चे की शिकायत के हकदार हैं।’’
‘‘साॅरी अंकल, आगे से ध्यान रखूंगी।’’-निशा ने माफी माँगते हुए कहा तो सक्षम भी बोल पड़ा,-‘‘ठीक है मम्मी, आगे से मैं भी ध्यान रखूँगा।’’-कहते हुए टी.वी.बन्द करके अपने भोजन की थाली उठाकर वह भी सबके बीच डायनिंग टेबिल पर आ बैठा। 

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2 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर आपकी रचनाओं ने मन मोह लिया...तुम नकार नहीं सकते वाकई बहुत ही दमदार रचना है..सूरज और यादें भी अपने आप में बहुत कुछ कह गईं रचनाएं हैं ...बधाई दिनेश जी....

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