तुम
 भूल तो सकते हो मेरे दोस्त
कुछ समय के लिए
उन शाश्वत सत्यों को
 और रख सकते हो
  छलावे में अपने आप को
  उन, मिथ्या और
   क्षणिक सुखों की
  
चासनी में डुबोकर
  जिनके सामने,
  
आगे-पीछे
  या फिर
  
ऊपर और नीचे
  तुम्हें कुछ दिखाई नहीं देता।
  कोई दर्पण
   जो तुम्हें
  तुम्हारा
  असली चेहरा
  
दिखाने की कोशिश करता है,
  
तुम्हारा अहं,
  
उसे चकनाचूर कर देता है।
 तुम्हें याद भी होगा
 या कहूं कि
 तुम्हें फुर्सत ही कहाँ है
 जो ये जानो कि
 अब तक कितने दर्पण,
 
तुम्हारी,
 
बेरहमी का शिकार हुए हैं।
 ऐसा हो कि
 एक दिन
 उनके टुकडे
 बिखरते-बिखरते
 इतने हो जायें कि
 
घर से बाहर निकले, तुम्हारे हर कदम को
 लहू-लुहान कर दें।
 तब,
 
और तब,
 
क्या होगा मेरे दोस्त,              
 जब गुजर जाएगा वह, जिसे,
 
आज तक,
 
तुम रोक पाए हो
  मैं
 और कोई अन्य ही।
 सच तो ये है कि
 वह अकेला ही नहीं गुजरता
 बल्कि अपने साथ
 सब कुछ,
 
हाँ-हाँ ... ..... कुछ
 बदलते हुए गुजरता है।
 और तब,
 
बियावान जंगल में
 भटक गए प्राणी-सा
एकाकी मन,
 
चीत्कार करता है,
 
छटपटाता है
 हा-हाकार करता है।
 पर,
 
इससे आगे,
 
कर कुछ नहीं सकता,
 
क्योंकि,
 
यही प्रकृति का नियम है।
 इसलिए पुन: कहता हूँ कि
 तुम,
 
भूल तो सकते हो मेरे दोस्त
 कुछ समय के लिए,
 
उन शाश्वत सत्यों को
 पर,
 
नकार नहीं सकते!
 नकार नहीं सकते मेरे दोस्त,!!
 
नकार नहीं सकते!!!

 

सूरज


मैं हूँ सूरज भोर का
दुश्मन हूँ तम घोर का।
रोज सबेरे आता हूँ
अपना फर्ज निभाता हूँ
किरणों के तीखे भाले से
तम को मार भगाता हूँ
कलियाँ खिलतीं फूल बिहँसते
चिड़ी चहकती शोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।
ठीक समय पर पहुँचा करता
नहीं बहाना करता हूँ
सर्दी-गर्मी या वर्षा हो
नहीं किसी से डरता हूँ
बर्फ गिरे, आँधी आये या
आये तूफां जोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।
बच्चो ! कभी नहीं कम होने
देना अपने साहस को
और कभी मत पास फटकने
देना अपने आलस को
फिर मेरी ही तरह तुम्हारा
स्वागत होगा जोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।

यादें


भोर से दोपहर हुई, फिर शाम घिर आई
किस प्रतीक्षा मे खड़ी तुम पेड  की छाया
ये अदाऐं रुप सागर और तरुणाई
सामने ज्यों रति खड़ी हो धरकर काया
झुनन-झुनन पायल के घंघरु की रूनझुन
बहक उठा मौसम भी जब गीत कोई गाया
दुखती रगों पर क्यों फिराती हो ये नाजुक कर
शूलों भरी है याद मेरी, और ये काया।

2 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर आपकी रचनाओं ने मन मोह लिया...तुम नकार नहीं सकते वाकई बहुत ही दमदार रचना है..सूरज और यादें भी अपने आप में बहुत कुछ कह गईं रचनाएं हैं ...बधाई दिनेश जी....

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